पढ़ेगा भारत तो बढ़ेगा भारत : डॉ. स्नेहलता

जागरूक जनता के संपादक शिवदयाल मिश्रा की शिक्षिका स्नेहलता भारद्वाज से एक चर्चा

जयपुर। कड़ी मेहनत और लगन के साथ-साथ अगर परिवार का साथ मिल जाए तो जीवन में सफलता दूर नहीं होती। एक बहुत ही साधारण परिवार में जन्मी डॉ. स्नेहलता भारद्वाज का जीवन इसी बात को सच करता है। डॉ. स्नेहलता से मुलाकात में उन्होंने अपने जीवन के बारे में जानकारी दी। डॉ. स्नेहलता भारद्वाज पुराना रामगढ़ मोड़ स्थित सरस्वती विद्यापीठ सीनीयर सैकण्ड्री स्कूल की ङ्क्षप्रसिपल हैं। एम.ए. बीएड., नैचरोपैथी एवं आयुर्वेद से डॉक्टरी की उपाधि प्राप्त डॉ. स्नेहलता का प्रारंभिक जीवन बहुत ही कष्ट पूर्ण रहा। सात भाईयों के बीच एक बहन जो भी सबसे छोटी। विडंबना देखिए कि तीन साल की उम्र में ही मां का साया सिर से उठ जाना। कैसे बीता होगा बचपन। किस्मत के खेल चलते रहे। डॉ. स्नेहलता ने बताया कि आॢथक तंगी के कारण सरकारी स्कूल में पढ़ाई की। शादी के समय उम्र मात्र 18 वर्ष और पढ़ाई चल रही थी, बीए द्वितीय वर्ष की। पति का पूर्ण सहयोग मिला और मेरी पढ़ाई जारी रही। इन्होंने कहा कि जब मैंने देखा कितनी परेशानी होती है पढ़ाई करने में और इसी कारण कितनी ही बच्चियां पढ़ाई से वंचित रह जाती हैं तो मैंने शिक्षा के क्षेत्र को ही अपना कार्यक्षेत्र चुना। 1995 में शादी हुई और 1998 में ग्रेजुएशन के बाद स्कूल ज्वाइन कर लिया। प्राइमरी से प्रारंभ स्कूल में मात्र 100 बच्चे थे जो आज सी. सैकण्ड्री तक शिक्षा प्रदान कर रहा है और छात्र संख्या है दो हजार। प्राइमरी से सीनियर सैकण्ड्री तक पहुंचने में बहुत सारी बाधाएं आई जिनमें मुख्य रूप से आॢथक तंगी थी। मगर हार मानना सीखा नहीं। हौंसले के साथ आगे बढ़ते गए। इस विद्यालय के कितने ही छात्र हैं जो यहां से निकल कर अच्छे पैकेज पर जॉब कर रहे हैं। कई सरकारी नौकरियों में चले गए। एक छात्र अरविंद ङ्क्षसह राठौड़) जो आज इनकम टैक्स इंसपेक्टर है। स्नेहलता ने बताया कि हमारे स्कूल में हमारे स्कूल ने लगभग 80-90 लोगों को रोजगार दे रखा है जिनमें 70 शिक्षक-शिक्षिकाएं हैं। स्कूल के साथ-साथ सामाजिक कार्यों में मेरी रुचि हुई। समाजसेवा हमारे खून में ही रचि-बसी है क्योंकि मेरी मां भी समाजसेवा से जुड़ी हुई थी। मेरा मूल उद्देश्य शिक्षा के प्रचार-प्रसार को लेकर है जिसमें हर बेटी बेटा एवं महिलाएं सब साक्षर हों। स्कूल में अनाथ और गरीब बच्चों के लिए नि:शुल्क शिक्षा एवं पुस्तकें भी दी जाती है। डॉ. स्नेहलता ने बताया कि जीवन में मां तो बचपन में चल बसी, मगर बाप और दो भाईयों का साथ छूटा तो मैं बहुत टूट गई थी, मगर मेरे पति और बच्चों ने मुझे संबल प्रदान किया और मैं उस दुख की घड़ी से उबर गई। जब मैं बच्चों को मुस्कराते हुए देखती हूं वे पल मेरे लिए ज्यादा खुशी के होते हैं। आगे की योजना के बारे में स्नेहलता ने बताया कि मेरा लक्ष्य बड़ा स्कूल, कॉलेज हो, जिसमें अच्छी और सस्ती शिक्षा प्राप्त की जा सके। सामाजिक कार्यों के लिए कई एनजीओ से जुड़ी स्नेहलता ने बताया कि इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए स्वयं ने स्नेहा फाउण्डेशन भी प्रारंभ किया है। शिक्षा के साथ सॢदयों में गरीबों को कंबल और भोजन आदि भी बांटने का कार्य किया जाता है। स्नेहलता को 2015 में समाज रत्न अवॉर्ड से नवाजा गया। इसके अतिरिक्त 20-25 संस्थाएं सम्मानित कर चुकी हैं जिनमें मोनीलेक हास्पीटल, सिटी आइकन अवॉर्ड, महिला सशक्तिकरण, राष्ट्रवादी साहित्यिक अवॉर्ड प्रमुख हैं। अनेक ब्राह्मण संगठनों से जुड़ाव और राजनीतिक गतिविधियों में भी शरीक रहने वाली स्नेहलता के जीवन में एक भयंकर एक्सीडेंट भी हुआ जिसमें हवलदार हरबंसलाल भूटानी के प्रयासों से नया जीवन मिला। पिछले दिनों जयपुर से बाघा बार्डर तक 'हुंकार दौड़Ó का आयोजन चामुण्डा सेना और राजस्थान पुलिस ने सम्मिलित रूप से किया था। इस दौड़ में डॉ. स्नेहलता और इनके पति ने भी भाग लिया। इनके साथ हवलदार हरबंसलाल भूटानी भी थे। दौड़ में भाग लेकर वापसी के समय रास्ते में कार की दूसरे वाहन से भयंकर टक्कर हो गई। उस टक्कर में डॉ. स्नेलता गंभीर रूप से घायल हो गई थी बाकी लोगों को मामूली चोट लगी थी। उस समय तात्कालिक सहायता के रूप में भूटानी मसीहा साबित हुए और इनकी ङ्क्षजदगी बच गई।  अंत में डॉ. स्नेहलता ने कहा कि 'पढ़ेगा भारत तो बढ़ेगा भारतÓ थीम हमारा लक्ष्य है।

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