हमारे देश की संस्कृति में मदर्स-डे के मायने!

हमारे देश में हमारी प्राचीन संस्कृति में जो तीज त्योहार आयोजित किए जाते हैं उनमें बड़ा भेद छुपा होता है। हमारी संस्कृति में माता-पिता, भाई-बहन, छोटे-बड़े बच्चों से लेकर पेड़ पौधों, पशु पक्षियों, नदी-नालों तथा जड़ और चेतन को समाहित कर उनके लिए सम्मान प्रदर्शित करने का अवसर प्रदान किया गया है। हम बात कर रहे हैं मदर्स-डे की तो हमारे देश में होली दीवाली पर मां-बाप और बड़े परिजनों के चरण छू कर आशीर्वाद लेने की परम्परा है। राखी त्योहार भाई बहन के अटूट संबंध को दर्शाता है। गुरु पूर्णिमा गुरु और शिष्य के संबंध को दर्शाता है। तीज और गणगौर पति-पत्नी के प्रेम का प्रतीक होता है। हमारा समाज और संस्कृति किसी भी प्रकार की उद्दंड संस्कृति का पक्षधर नहीं है। शादी से पूर्व युवक-युवतियों को साथ रहने का भी पक्षधर नहीं है। हमारे समाज में बच्चे मां-बाप के साथ ही रहते हैं वे हर दिन मां-बाप के चरण स्पर्श करते हैं भले ही आजकल ये परम्परा कम होती जा रही है। एक दिन के लिए मदर्स-डे मनाने का यहां कोई औचित्य नहीं है। ये तो पाश्चात्य संस्कृति के द्योतक हैं। जहां ी पुरुष एक से अधिक शादियां करते हैं और बच्चे मां-बाप से अलग रहने को मजबूर होते हैं। उन्हें अपने मां-बाप से मिलने के लिए साल में कम से कम एक बार तो मौका मिले। इसलिए पाश्चात्य देशों में मदर्स-डे, फादर्स-डे, वेलेंटाइन-डे आदि कितने ही डे मनाए जाते हैं। अभी हाल में मदर्स-डे पर जिंदा और स्वर्गवासी माओं के साथ खूब सारी फोटो सोशल मीडिया पर देखी गई। जीते जी चाहे उन्हें पता नहीं किन मुश्किलों से गुजरना पड़ा होगा। संतानों ने कितने कष्ट दिए होंगे, मगर मदर्स-डे के नाम पर उनकी फोटो को फेसबुक और वाट्सएप पर खूब शेयर किया गया। आधुनिक माओं द्वारा भी कई तरह के कार्यक्रम भी मदर्स-डे पर किए गए। आजकल मां तो बच्चों को गोद में लेकर चलने से भी परहेज करती हैं, उन्हें एक छोटी से गाड़ी में गुड़काते हुए कार्यक्रमों में जाते देखा जा सकता है। क्या एक दिन फोटो दिखाने से मां के प्रति हो गई जिम्मेदारी पूरी। क्यों हम हमारी संस्कृति को मिटाने पर आमादा हो रहे हैं। इतना ही अगर मां-बाप से प्रेम है तो फिर क्यों वृद्धाश्रम और अनाथाश्रम में मां-बाप टुकुर-टुकुर दरवाजे की तरफ टकटकी लगाए एकाकी जीवन जीने को मजबूर हैं।

-शिवदयाल मिश्रा

shivdayalmishra@gmail.com

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