बंधुआ बनते ब्राह्मण!

धर्म की जड़ सदा हरी। ऐसी कहावत है और धर्म की जड़ को हरी रखता है ब्राह्मण। इस समय ब्राह्मण बड़ी दुविधा में है जबकि ब्राह्मण की वास्तविकता से दूर रहने वाले उन्हें सवर्ण, शोषण करने वाला, पाखंड करने वाला और ना जाने क्या-क्या कहते हैं। मगर वास्तविकता ये है कि आज के ब्राह्मण को अपना पेट पालना भी दूभर हो रहा है। कुछ अपवादों को छोड़कर। क्योंकि अपवाद तो हर जगह मौजूद रहते हैं। ब्राह्मण पेट भरने के लिए मजदूरी करता है। ब्राह्मणत्व को मजदूरी में ही देख लीजिये। कई पैसे वाले सेठ-साहूकार, फैक्ट्री मालिक या और भी जो अपने आपके धंधे को बढ़ाने के लिए या भगवान को, लक्ष्मीजी को प्रसन्न करने के लिए पाठ-पूजा करवाते हैं। वे ब्राह्मण को अपने प्रतिष्ठान अथवा अपने घर पर बुलाकर प्रात: से सायंकाल तक बंधुआ मजदूर की तरह पाठ-पूजा, ोत पठन आदि कार्य करवाते हैं। इस कार्य के बदले में उन्हें 500 या 700 रुपए कभी कभी तो इससे भी कम दक्षिणा के दिए जाते हैं। जिसमें दिनभर बैठे रहकर पवित्रता के साथ एक समय भोजन करके वह इस कार्य को करता है। आज के जमाने में बेलदार और फुटकर काम करने वालों को इतना या इससे भी ज्यादा मेहनताना मिलता है। जिस प्रकार कई ठेकेदार मकानों के या अन्य किसी भी प्रकार के कामों का ठेका लेकर वह मजदूरों से काम करवाता है। इसी प्रकार ब्राह्मणों में भी ठेकेदार मौजूद हैं जो किसी भी प्रकार की पाठ-पूजा का ठेका लेते हैं और पंडितों की मजदूरी और व्यवस्था वह स्वयं करते हैं। यजमान तो सिर्फ उसको पैसे दे देता है। दूसरी तरफ जब यजमान ब्राह्मण से पाठ-पूजा करवाता है तो उसे सामान, बर्तन, कपड़ा आदि भेंट में देता है वे बड़ी ही हल्की किस्म के होते हैं। आजकल सिलाई वैसे ही कपड़ों से कई गुना महंगी हो गई है। ऐसे में वे कपड़े किसी काम के नहीं होते हैं तथा बर्तन भी पंडितों के घरों में ढेर हो जाते हैं तो उन्हें ओने-पोने दामों में वापस दुकानदारों को बेचने पड़़ते हैं उदाहरण के लिए जो सामान दस रुपए का होगा, उसे 2 रुपए में बेच दिया जाएगा। ये तो रही पाठ-पूजा के काम की बात। दूसरी तरफ सब तरह की मजदूरी ठेला हांकना, रिक्शा चलाना, मिट्टी डालना, कहने का मतलब जिस भी प्रकार की मजदूरी आम आदमी करता है वैसे ही मजदूरी ब्राह्मण भी करता है। ऐसे में कोई किस आधार पर कह सकता है कि ब्राह्मण शोषण करता है। आज के जमाने में तो ब्राह्मण ही ब्राह्मण का शोषण कर रहा है। इस समय समाज का हर वर्ग जिस तरह अपना जीवनयापन कर रहा है ठीक उसी प्रकार ब्राह्मण परिवार भी कर रहे हैं। कहीं कोई ऊंच-नीच नजर नहीं आ रही है। सब जाति-प्रजातियां एकमेव है। अत: ब्राह्मण शोषक पहले भी नहीं था और आज भी नहीं है। फर्क सिर्फ अनजाने में कुछ भी कह देने का है।

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