समानता का अधिकार या बदले की भावना!

जब हमारा देश स्वतंत्र हुआ था, उस समय राम राज्य की कल्पना की गई थी, जिसमें सभी को समानता का अधिकार हो। और उसी भावना को साकार करने के लिए संविधान में सबको समान अधिकार दिए गए। मगर न जाने कहां से ये असामनता का अंकुर फूट गया और अंकुर से फोड़ा बनते हुए नासूर बन गया है जो मिटने का नाम ही नहीं ले रहा है। जब संविधान की दुहाई देते हुए हमारे विद्वत्जन और जन प्रतिनिधि समानता की बात करते हैं तो फिर ये बात कहां से और किसने पैदा कर दी कि सवर्ण हमेशा से दूसरी जातियों का शोषण करते रहे हैं। सवर्णों पर शोषण का आरोप मढ़ा जा रहा है और हमारे समाज में समानता से जीने के बजाए राजनीतिज्ञों ने आरक्षण प्रदान कर बदले की भावना को जन्म दे दिया। समाज में समरसता के बजाए विघटन और वैमनस्यता के बीज बो दिए गए। स्वतंत्रता की लड़ाई में सबने मिलकर अपना-अपना योगदान दिया। बहुतेरे नौजवानों ने जेल की यातनाएं सहीं और बहुतेरों ने अपने जीवन की आहुतियां दे डाली। तब जाकर स्वतंत्रता मिली। स्वतंत्रता के बाद आरक्षण की व्यवस्था ने समाज को तोड़कर रख दिया। समानता का अधिकार है तो फिर सबको समानता से जीने देना चाहिए। बार-बार यह कहकर कि एससी और एसटी को अनादि काल से सताया जा रहा है। सताया गया या नहीं, मगर वर्तमान में तो बदले की भावना से साफ दिखाई दे रहा है। योग्य व्यक्तित्व को रौंदते हुए अयोग्य को वरीयता दी जा रही है। जबकि शोषण रहित सबको समान अधिकार होना चाहिए। अगर कोई शोषण करे तो उसे दंडित किया जाना चाहिए। मगर इस सबके बजाए पूरी व्यवस्था ही बदले की भावना के भेंट चढ़ गई है। हम कैसे कह सकते हैं कि संविधान में दिया हुआ समानता का अधिकार हमें प्राप्त है। 

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