क्यों नहीं होता विश्वास!

आज की भागदौड़ भरी ङ्क्षजदगी में कोई भी ऐसा नहीं दिखाई देता जिसे कोई फिक्र नहीं है। सब लोग इधर से उधर फिक्र के मारे भागे जा रहे हैं। रुकने का नाम ही नहीं लेते। किसी को बच्चों की फिक्र। किसी को पढ़ाई की फिक्र। किसी को बच्चों की शादी-विवाह की फिक्र। ऐसे न जाने कितने ही प्रकार के फिक्र लिए आदमी यहां से वहां दौड़ता रहता है। मगर कुछ ऐसी जगह है जहां आदमी अधिकांश बिना फिक्र किए आराम से रहता है। उदाहरण के लिए हम यात्रा पर जाते हैं यात्रा छोटी हो या बड़ी। पूरा जोखिम होता है। मगर हमें फिक्र नहीं कि हमारी यात्रा पूरी होगी या नहीं। उदाहरण के लिए हवाई यात्रा करते समय हमें हवाई जहाज में बैठना होता है। हवाई जहाज आसमान को छूता हुआ उड़ता है मगर हमें बिल्कुल भी ङ्क्षचता नहीं होती जबकि उसके ड्राईवर को हम जानते भी नहीं। जहाज की यात्रा करते समय हम समुद्र में चलते हैं निश्चिन्तता से बैठते हैं जबकि जहाज के चालक को भी हम नहीं जानते। बस और ट्रेन में भी हम बेफिक्र होकर चलते हैं जगह नहीं होने पर हम खिड़कियों पर लटकते हुए चलते हैं। लड़ते-झगड़ते गाड़ी में सिर्फ घुसने की जगह चाहिए मगर हमें निङ्क्षश्चतता रहती है कि हम हमारे गंतव्य तक पहुंच जाएंगे। जबकि हम उपरोक्त चालकों में से किसी को भी नहीं जानते होते हैं। मगर एक विश्वास होता है जिसके सहारे हम इनमें सवार हो जाते हैं। दूसरी ओर ईश्वर की व्यवस्था इतनी दुरुस्त होती है कि कहीं से कहीं तक गलती या चूक नहीं होती। ईश्वर की व्यवस्था को देखिए बच्चा पैदा नहीं होता उसके पहले ही उसकी जन्मदात्री मां के स्तनों में दूध आने लगता है। ये ईश्वरीय व्यवस्था ही तो है। मगर हम सांसारिक जीवन में निश्ंिचत नहीं क्योंकि हमें ईश्वर में विश्वास ही नहीं है। जबकि हमारे जीवन की सारी व्यवस्था ईश्वर ने कर रखी है। अपने काम को ईमानदारी से करें और ईश्वर में विश्वास रखें तो निश्चित ही हम हमारे गंतव्य तक पहुंच जाएंगे। 

-शिवदयाल मिश्रा

shivdayalmishra@gmail.com

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