पार्षद को छोड़ो यार! मैं हूं ना पार्षद पति

-शिवदयाल मिश्रा
पति शब्द का अर्थ तो बहुत विश्लेषित होता है। ज्यादा गहराई में न जाकर इतना ही ठीक है कि पति का शाब्दिक अर्थ होता है मुख्य। अर्थात जिस शब्द से मुख्य होना या एक समूह का मुखिया होना भासित हो। जैसा मैंने कई विद्वानों के मुंह से सुना है। इसके अलावा पति शब्द के साथ एक अक्षर आगे या पीछे जुडऩे से कितना अर्थ बदल जाता है जैसे पति+त=पतित अर्थात गिरा हुआ। अगर पति शब्द के आगे त अक्षर जुड़ जाए तो तपति हो जाता है यानी तपन गर्मी, तेज इस तरह इनके अर्थ बदल जाते हैं। पति भी कई तरह के होते हैं जैसे राष्ट्रपति, सभापति, उप सभापति, दम्पति, पंच पति, लखपति, करोड़पति, खगपति, प्रजापति, जगतपति, कुलपति, पशुपति, लक्ष्मीपति, उमापति। इनके अलावा और भी कई प्रकार के पति होंगे, मगर अभी ध्यान में नहीं आ रहे हैं। मगर आजकल दो पति और हैं जो गाहे-बगाहे कहीं भी नजर आ जाते हैं। ग्रामीण इलाकों में सरपंच पति और शहरी इलाकों में पार्षद पति। ये दो नए शब्द कुछ वर्षों से प्रचलन में आने लगे हैं। सरकार ने महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए निकायों में उनके लिए सीटें निश्चित कर दी।  महिलाओं के नाम सीट निर्धारित हुई और वे चुनकर जन प्रतिनिधि भी बन गई। मगर क्या करे, बेचारी पत्नी। वह तो अपने पति के पीछे-पीछे ही तो चलेगी और जहां पति नहीं ले जाना चाहे वहां कैसे जाएगी। घर पर ही रहेगी। (सारी महिलाओं पर यह बात लागू नहीं होती) जहां भी पब्लिक मीङ्क्षटग होती है कोई कार्यक्रमों के आयोजन होते हैं वहां सरपंच पति और पार्षद पति मौजूद रहते हैं। बुलावा पार्षद का होता है पहुंच जाते हैं पार्षद पति। बड़े कलफदार खादी के कुर्ता-पायजामा पहने विधायक और सांसद की बगल में बैठकर मेहमान अतिथि बनकर स्वागत-सत्कार का आनंद लेते हैं। कोई ये तो बताए इन पार्षद पति को किस हैसियत से स्टेज पर जगह मिलती है। अगर पार्षद का निमंत्रण है तो पार्षद ही जाए। नाम पार्षद का और काम पार्षद पति का। वाह री व्यवस्था। कैसी धुप्पल चली हुई है। पार्षद को तो पता ही नहीं होता कि पार्षद पति क्या-क्या निर्णय कर चुके हैं उन्हें तो चिन्हित जगहों पर दस्तखत करने होते हैं। 

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