अच्छा बनने के लिए मरना पड़ता है!

आदमी जीने के लिए न जाने कितने पापड़ बेलता है। सुबह से शाम तक खटता रहता है। अपने गृहस्थ जीवन को चलाने के लिए। कितने ही लोग जीवन में मिलते हैं कोई अच्छा और कोई बुरा। मगर अच्छे और बुरे का आकलन कोई कैसे करे। जिसके साथ जिसके विचारों की पटरी बैठ जाती है वो ही अच्छा और जिसके साथ वैचारिक तालमेल नहीं सहमति नहीं वही आदमी बुरा लगने लगता है। किसी जमाने में अच्छा बनने और अच्छा सुनने की होड़ सी लगी रहती थी। अच्छे कार्य करने के लिए भी सब लोग आगे आते रहते थे। आने को तो आज भी आते हैं मगर आज अधिकांश लोग प्रशंसा के भूखे हो गए। लेकिन प्रशंसा है कि हर किसी को नसीब नहीं होती। एक आदमी सुबह से शाम तक लगा रहता है उससे कोई पूछने वाला नहीं कि तेरा क्या हाल है आपने बहुत परिश्रम किया है बहुत अच्छा किया है। मगर एक है जो कि सुबह से शाम तक गप्पे मारते रहता है काम-धाम कुछ नहीं करता, मगर उसके तथाकथित कामों की प्रशंसा करने वालों की कमी नहीं होती। ये सब बातें तुलसीदासजी ने रामायण में इंगित की है-

सुनहू भरत भावी प्रबल, बिलख कहहीं मुनिनाथ।

हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश-अपयश विधि हाथ।।

हमारे शाों के अनुसार उपरोक्त छह चीजें भगवान अपने हाथ में रखता है ये जन्म से पहले ही निर्धारित हो जाती हैं। मगर एक बात तो है कोई कैसा भी दुष्ट वृत्ति का मनुष्य हो। चाहे उसने अपने जीवन में कैसे और पता नहीं क्या-क्या किया। मगर उसके मरने के पश्चात लोगों के मुंह से निकलता ही है कुछ भी कहो भई! आदमी तो अच्छा ही था। 

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