द्वादशज्योतिलिंग मन्दिर-श्रीकंचनधाम

ॐ नमः शिवय

ॐ कंचन देवाय नमः, ॐ श्रीसद्गुरू देवाय नमः

सम्पूर्ण भारत का अति भव्य विशाल एवं आलोकिक द्वादशज्योतिलिंग मन्दिर-श्रीकंचनधाम (बूंदी लखेरि मार्ग, ज़िला- बूँदी-राजस्थान)

हमारे धर्मशस्त्रों के अनुसार एक दिव्य शिव लोक है, उसमें दिव्य कैलाश है जहाँ ओमकार स्वरूप परमात्मा परम शिव नित्य निवास करते हैं।

पृथ्वी लोक में भी वही दिव्य शिव लोक, दिव्य कैलाश ऐवम परम शिव अनेक पवित्र इस्थानो पर अंश ऐवम प्रतिबिम रूप से इस्थित है । हमें विश्वास है राजस्थान के बूंदी ज़िले में इस्थित श्रीकंचन धाम अप्रकट रूप से दिव्य शिव लोक तथा दिव्य कैलाश का प्रारूप है जहाँ साक्षात भगवान शिव द्वादश ज्योतिर्लिंग रूपों में इस्थापित है ।

यहाँ के ज्योतिर्लिंग मात्र पाषाण मूर्तियाँ नहीं बल्कि तेजोमेय प्रकाश पुंज है, जिनमें ध्यान से देखने पर अनेक बार रत्न एवं मणियों की तरह ज्योतिदर्शन का आभास होता है ।

यहाँ के अधिष्टाता सद्गुरुदेव कृष्णदास श्रीकंचनजी महाराज शिव पुराण में वर्णित शिव अवतार एक योगेश्वर हैं जो मनुष्य रूप से जगत के कल्याण के लिए रहस्यमय रूप से पूर्वदेश असम प्रांत के नीलाचल पर्वत पर माँ कामाख्या क्षे पर प्रकट हुये ,

वहाँ से भगवान श्रीराधाकृष्ण की जन्मस्थली ब्रज धाम में अनेक लीलाएँ की, वहीं से संपूर्ण भारत के प्रमुख धर्मस्थल तीर्थस्थल आदि का भ्रमण करते हुए लोगों का ज्ञान, कर्म, धर्म, भक्ति, एवं अध्यात्म का संदेश दिया सुखी जीवन के लिये अनेक लोगों का कष्टनिवारण, रोगमुक्ति तथा समस्याओं का समाधान किया ।

शिव स्वरुप श्रीसद्गुरूदेव ने भगवान शिव के आदि क्षेत्र अबुर दारण्य की प्राचीन अरावली पर्वत माला के पाश्वर में स्थित प्राचीन कंचननगर में ,ऋिषमुनि महात्माओं द्वारा सेवित , अनेक अश्वमेघादि यज्ञों द्वारा पवित्र भूमि पर पधारकर यहाँ श्रीकंचनधाम की स्थापना की तथा समस्त वैदिक विघि विघान से द्वादश ज्योतिर्लिंगो को प्रतिष्ठा कराया ।

वर्तमान में श्रीकंचनधाम के द्वादश ज्योतिर्लिंग मंदिर भूगभस्थित रत्न, स्वर्ण, रजत आदि धातु, पाषाण, औषघि, वनस्पति, जलधारा आदिमय भूकेलाश के ऊपर स्थित हैं। भविष्य में यह भूगर्भ स्थित पर्वत

एक दिन अवश्य ऊपर आयेगा ओर अपनी प्रखरज्योति से जगत का अज्ञान ओर अन्याय का अंधकार मिटायेगा ।

श्री कंचनधाम की आलोकिकता सम्बंधी एक आभास

एक दिन उषाकाल से कुछ पूरव अघजागरत अवस्था में देख रहा हूँ जेसे में अनायास ही श्रीकंचनधाम पहुँच गया, वहाँ श्रीसद्गुरूदेव श्रीकंचनजी महाराज अपने निवास स्थान के पास स्थित अपने चौकिनुमा आसन पर विराजमान हैं , उनके सम्मुख उनके तीन चार अन्तरंग शिष्य बैठे हुये हैं।

मैंने जाते ही जेसे श्रीगुरूदेव को प्रणाम किया उन्होंने कहा मैंने तुम्हें बुलाया है । इतना कहकर वे उठे और जहाँ गोलाकार स्थान पर द्वादश ज्योतिर्लिंग मंदिर हैं उधर शीघरगति से गये ।

अकस्मात उस स्थान पर द्वादश ज्योतिर्लिंग मंदिरो की जगह एक ऊँचा पर्वत दिखने लगा जो चारों ओर सधन वृक्षों से आचछादित है। श्रीगुरुदेव उस पर्वत के शिखर पर चढ़कर वहीं विराजमान हो गये। में नीचे खड़ा उन्हें देखने लगा। श्रीगुरुदेव ने ऊपर से ही मुझे आदेश दिया ॐ नमः शिवाय बोलते हुए पूरे क्षेत्र की परिक्रमा करो।

ज्योहि एक किनारे से मैं परिक्रमा करने लगा, में देखता हूँ - सम्पूर्ण.... श्रीकंचन धाम क्षेत्र गोलाकार है और आकाश में अधर में स्थित है। उसके चारों ओर एक संकरी पगडंडी है जहाँ से पूरी पृथ्वी नीचे दिखाई दे रही है तथा नगर, गाँव, नदी, पर्वत,मकान, पेड़, पोधे आदि सभी इस तरहदिख रहे हैं जेसे उड़ते हुये हवाईजहाज से खिड़की से नीचे का दृश्य दिखाई देता है । मैंने मंत्र का जाप करते हुये परिक्रमा प्रारम्भ की और भी कई दृश्य दिखाई दिये ।

ज्योंहि परिक्रमा पूरी हुई आँख खुल गई । हर्ष एवं आश्चर्य से रोम रोम खिल उठा । तीन चार दिन बाद जब श्रीगुरुदेव से मिलने गया उन्हें यह घटना सुनाई। में समझता हूँ यह रहसयमय सत्य का एक आभास हैं।

जय जय सद्गुरू श्रीकंचनदेव , जय जय श्रीकंचनधाम

।। हरि ॐ तत्सत् ।।

 

गौशाला परिचय

गाय देश का

धर्मशास्त्र है, कृषिशास्त्र है

अर्थशास्त्र है, नीतिशास्त्र है।

उद्योगशास्त्र है, समाजशास्त्र है

विज्ञान्शास्त्र है, आरोग्यशास्त्र है।

पर्यावरणशास्त्र है, आध्यात्मशास्त्र है।

दाँतों तले तृण दाब कर दीन गायें कह रहीं,

हम पशु तुम हो मनुज पर योग्य क्या तुमको यही।

हमने तुम्हें माँ की तरह है दूध पीने को दिया।

देकर कसाई को हमें तुमने हमारा वध किया।

क्या वश हमारा है भला हम दीन हैं बलहीन हैं।

मारो कि पालो कुछ करो, तुम हम सदैव अधीन है।

प्रभु के यहाँ से सभी कदाचित आज हम असहाय हैं।

इससे अधिक अब क्या कहें हाँ हम तुम्हारी गाय है।

जारी रहा यदि यही क्रम यहाँ यों ही हमारे नाश का।

तो अस्त समझो सूर्य भारत भाग्य के आकाश का।

जो तनिक हरियाली रही वह भी नहीं रह पाएगी।

यह स्वर्णभूमि कभी मरघट ही बन जाएगी।

जो गाय अपनी स्वस्थ अवस्था में हमें अमृत समान दूध देती है, खेती के लिए बैल देती है, ईंधन के लिए गोबर देती है और जिसका मूत्र औषधियों में काम आता है, उसी गाय को लोग वृद्ध होने पर जंगल में छोड़ देते हैं, जहां से उसे कुछ लोग पकड़कर बूचड़खानों में कत्ल होने के लिए बेच देते हैं। कई बार ऐसी गायों को सीधे ही बूचड़खानों में भेजे जाने के लिए बेच दिया जाता है।

मानवीय आधार पर ऐसी गायों की देखभाल के लिए और उनका शेष जीवन भी शांतिपूर्वक गुजरे, इस भावना के साथ मुनिश्री विद्यासागरजी के मार्गदर्शन में गौशालाओं का संचालन किया जा रहा है। इन गौशालाओं में उन गायों को रखा जाता है जो दूध नहीं देती और जिन्हें उनके मालिकों द्वारा छोड़ दिया जाता है या जिन्हें बूचड़खाने ले जाए जाने से बचाया जाता है। आप भी ऐसी गायों का जीवन बचाने में अपना सहयोग दे सकते हैं।

जय जय सद्गुरू श्रीकंचनदेव , जय जय श्रीकंचनधाम

 

।। हरि ॐ तत्सत् ।।

 

 

श्री सोमनाथ

स्थान - सौराष्ट्र

गुजरात प्रांत के काटीयावॉड ( सौराष्ट्र ) में प्राचीन प्रभास षेत्रा समुद्र के किनारे यह विश्व प्रसिध्द मंदिर इस्थापित है।

श्री मल्लिकअर्जुन

श्री महाकाल

श्री ओंकारेश्वर ममलेश्वर

श्री नागेश्वर

श्री बैजनाथ

श्री भीमशंकर

श्री त्र्यंम्बकेश्वर

श्री घुमेश्वर

श्री केदारनाथ

श्री विश्वनाथ

 

श्री रामेश्वरम्‌

 

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