बालिकाओं की तरह बालकों को क्यों नहीं साइकिल!

कहने को तो हमारा संविधान सबको समानता का अधिकार देता है। मगर संविधान के अनुसार चलने वालों ने संविधान को ही ताक पर रख दिया। और मनमाने बदलाव तथा सुधारों के नाम पर जिधर देखो उधर ही भेदभाव उत्पन्न कर दिए। कैसे मानें या समझें कि सरकारी व्यवस्था संविधान के अनुसार चल रही है। धर्म के आधार पर भेदभाव, जाति के आधार पर भेदभाव, पढ़ाई में भेदभाव, नौकरी में भेदभाव, बस के किराए में भेदभाव, घर में भेदभाव, समाज में भेदभाव, महिला और पुरुष में भेदभाव, बालक और बालिकाओं में भेदभाव। चारों तरफ बड़े-बड़े अधिकारी और कर्मचारी भेदभाव के आरोप लगाकर अंदोलन कर रहे हैं। धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। संवैधानिक संस्थाओं में बैठकर हमारे जनप्रतिनिधियों द्वारा भेदभाव के आरोप लगाए जाते हैं। भेदभाव एक ऐसा शब्द बन गया है जो कहीं वास्तव में तो कहीं झूठे तौर पर प्रयोग होने लगा है। मेरी आज मूल बात है सरकारी स्कूलों में साइकिल वितरण को लेकर भेदभाव के बारे में। सरकार ने नारा दिया कि 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओÓ। बेटियों के लिए यह बहुत अच्छी बात है। तो क्या बेटों को नहीं पढ़ाना चाहिए। क्या बेटों को नहीं बचाना चाहिए। हमारा समाज तो बेटे और बेटियों को हर बुराई से बचाने की सीख देता है। साथ ही, पढ़ाने की भी। मगर ये क्या व्यवस्था। क्या बेटों को दूर से स्कूल आने में समय नहीं लगता। क्या वे उड़ कर आ सकते हैं। जब हम समानता की दुहाई देते हैं तो फिर समानता रही कहां। ये तो समानता के अधिकार का ही हनन है। अगर यही स्लोगन 'सबको पढ़ाओ, सबको बचाओÓ होता तो कितना अच्छा लगता। आजकल चारों तरफ केवल महिलाओं को लेकर चर्चाएं चलती रहती हैं। जैसे पुरुष का तो कोई वजूद ही नहीं है। बेचारा पुरुष। महिला दिवस मनाया जाता है। पुरुष दिवस क्यों नहीं मनाते। अगर मनाते भी होंगे तो पता ही नहीं चलता कब निकल गया। कहने का तात्पर्य है कि समानता के नाम पर असमानता को बढ़ावा दिया जा रहा है। छोटे-छोटे बच्चे-बच्चियां स्कूल जाते हैं। सबको सब सुविधाएं समान रूप से मिलनी चाहिए। तभी हम आगे बढ़ पाएंगे वरना मानसिकता कुंठित होनेे लग जाएगी। जैसे आरक्षण पर दिखाई देने लगी है।

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