जियो साठ से ठाठ में!

दुनिया में हर कोई किसी भी वस्तु एवं परिस्थितियों को अपनी-अपनी नजर से देखता है और उसी के अनुरूप अपने विचार बना लेता है। जैसे विचार एक बार बन जाते हैं वैसे ही उनकी परिणिती होने लग जाती है। मनुष्य के जीवन में तीन अवस्थाएं आती हैं। बचपन, जवानी और बुढ़ापा। इन तीनों अवस्थाओंं पर विद्वानों ने, अनुभवी व्यक्तियों ने, कवियों और गीतकारों ने भी अपने-अपने तरीके से इसका वर्णन किया है। किसी ने बचपन को अच्छा, तो किसी ने जवानी को अच्छा बताया है। मगर बुढ़ापे के बारे में सभी ने चेताया है और बात-बात में कहा भी गया है -

बुढ़ापा बड़ा बुरा है भई, क्यों इतराता है तेरा भी बुढ़ापा आएगा। तेरे साथ भी ऐसा ही होगा।

माना कि बुढ़ापे में शरीर कमजोर हो जाता है, कम दिखता है और कम सुनाई देने लग जाता है। मगर हम इसे आसान और आनन्दपूर्वक भी जी सकते हैं। बुढ़ापे की कोई उम्र तो बता नहीं सकता है, क्योंकि कोई कम उम्र में ही बुढ़ापे का ऐहसास करने लग जाता है और कोई मरते दम तक सुखी और प्रसन्नचित्त जीने की आदत बना लेता है जिसके कारण उसे बुढ़ापे का एहसास ही नहीं होता। फिर भी सरकार ने बुढ़ापे की उम्र फिक्स कर रखी है जिसके अनुसार 60 वर्ष होते ही उसे काम करने योग्य नहीं मानकर सेवानिवृत्त कर दिया जाता है। तो वास्तव में जीने का मजा ही 60 वर्ष के बाद आता है। क्योंकि बचपन की तरह बात-बात पर कोई नहीं डांटता, स्कूल के होमवर्क की चिंता भी नहीं रहती है। जवानी का संघर्ष भी लगभग खत्म हो गया होता है जिसमें चिंता की लकीरें ललाट पर खिंची रहती थी। बेफिक्री के दिन रहते हैं। किसी जवान को परेशानी में रोते देखकर बुजुर्ग आदमी को हंसी आती रहती है। आफिस की टिक-टिक से भी छुटकारा, न ऑफिस जाने की जल्दी न झंझट। बस का इंतजार भी नहीं करना पड़ता। खुशी से दोस्तों के बीच भगवान या राजनीति की चर्चा में अलग ही आनन्द आता है। बेफिक्र होकर खुली हवा में सांसें लेने का समय। पोते-पोतियों के साथ खेलो और खिलाओ। बेटे-बहुओं का प्यार पाओ और उनका होंसला बढ़ाओ। अगर माने और पूछे तो बच्चों के साथ अपने अनुभव भी बांटो। उन्हें सलाह दो, ताकि अनचाही परेशानियों से बच सकें। आसपास के बच्चे और जवान सब बड़ी विनम्रता से प्रणाम करते हैं उन्हें तरक्की करने का आशीर्वाद दो। यही तो साठ के ठाठ हैं।

जियो साठ से ठाठ में!

दुनिया में हर कोई किसी भी वस्तु एवं परिस्थितियों को अपनी-अपनी नजर से देखता है और उसी के अनुरूप अपने विचार बना लेता है। जैसे विचार एक बार बन जाते हैं वैसे ही उनकी परिणिती होने लग जाती है। मनुष्य के जीवन में तीन अवस्थाएं आती हैं। बचपन, जवानी और बुढ़ापा। इन तीनों अवस्थाओंं पर विद्वानों ने, अनुभवी व्यक्तियों ने, कवियों और गीतकारों ने भी अपने-अपने तरीके से इसका वर्णन किया है। किसी ने बचपन को अच्छा, तो किसी ने जवानी को अच्छा बताया है। मगर बुढ़ापे के बारे में सभी ने चेताया है और बात-बात में कहा भी गया है -

बुढ़ापा बड़ा बुरा है भई, क्यों इतराता है तेरा भी बुढ़ापा आएगा। तेरे साथ भी ऐसा ही होगा।

माना कि बुढ़ापे में शरीर कमजोर हो जाता है, कम दिखता है और कम सुनाई देने लग जाता है। मगर हम इसे आसान और आनन्दपूर्वक भी जी सकते हैं। बुढ़ापे की कोई उम्र तो बता नहीं सकता है, क्योंकि कोई कम उम्र में ही बुढ़ापे का ऐहसास करने लग जाता है और कोई मरते दम तक सुखी और प्रसन्नचित्त जीने की आदत बना लेता है जिसके कारण उसे बुढ़ापे का एहसास ही नहीं होता। फिर भी सरकार ने बुढ़ापे की उम्र फिक्स कर रखी है जिसके अनुसार 60 वर्ष होते ही उसे काम करने योग्य नहीं मानकर सेवानिवृत्त कर दिया जाता है। तो वास्तव में जीने का मजा ही 60 वर्ष के बाद आता है। क्योंकि बचपन की तरह बात-बात पर कोई नहीं डांटता, स्कूल के होमवर्क की चिंता भी नहीं रहती है। जवानी का संघर्ष भी लगभग खत्म हो गया होता है जिसमें चिंता की लकीरें ललाट पर खिंची रहती थी। बेफिक्री के दिन रहते हैं। किसी जवान को परेशानी में रोते देखकर बुजुर्ग आदमी को हंसी आती रहती है। आफिस की टिक-टिक से भी छुटकारा, न ऑफिस जाने की जल्दी न झंझट। बस का इंतजार भी नहीं करना पड़ता। खुशी से दोस्तों के बीच भगवान या राजनीति की चर्चा में अलग ही आनन्द आता है। बेफिक्र होकर खुली हवा में सांसें लेने का समय। पोते-पोतियों के साथ खेलो और खिलाओ। बेटे-बहुओं का प्यार पाओ और उनका होंसला बढ़ाओ। अगर माने और पूछे तो बच्चों के साथ अपने अनुभव भी बांटो। उन्हें सलाह दो, ताकि अनचाही परेशानियों से बच सकें। आसपास के बच्चे और जवान सब बड़ी विनम्रता से प्रणाम करते हैं उन्हें तरक्की करने का आशीर्वाद दो। यही तो साठ के ठाठ हैं।

shivdayalmishra@gmail.com

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