स्तरहीन भाषा हमारी संस्कृति में तो नहीं है!

लोकसभा का चुनाव का ऐलान हो गया है। चुनावों को देखते हुए हर पार्टी अपने-अपने ऐजेंडे भी चलाती है। एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप भी लगाए जाते हैं। हर पार्टी अपना विजन जनता के सामने प्रस्तुत करती हैं। हर चुनाव में पार्टी सत्ता पक्ष और विपक्ष में रहते हुए एक-दूसरे को पटखनी देने को आतुर रहती हैं। मगर पिछले कुछ वर्षों से जब-जब भी चुनाव आता है। नेताओं की भाषा मर्यादाहीन हो जाती है। जुबान बदलकर बदजुबान हो जाती है। ठीक है चुनाव होते हैं तो कोई जीतता है कोई हारता है, बल्कि यूं कहिए कि अगर एक सीट पर 50 सदस्य चुनाव लड़ते हैं तो मात्र एक जीतता है और 49 हारते हैं। जीतना हर कोई चाहता है। इसलिए वह सामने वाले प्रत्याशी पर झूठे-सच्चे जैसा उसके दिमाग में आता है या जितनी उसके पास जानकारी होती है उसके आधार पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए जाते हैं। मगर इन दिनों कुछ ज्यादा ही मर्यादाहीन भाषा का इस्तेमाल होने लगा है जो कहीं से कहीं तक सही नहीं कहा जा सकता। भले ही चुनाव की हार-जीत के बाद सब नेता एक-दूसरे से सौहार्दपूर्ण वातावरण में बात करें। मगर जनता के समक्ष ऐसी-ऐसी भाषा का इस्तेमाल मंच से कर जाते हैं जो मुझे यहां लिखने में भी शर्म महसूस हो रही है। सोशल मीडिया के तो कहने ही क्या हैं? कुछेक अपनी-अपनी पार्टियों के समर्थक तो हद से गुजरी हुई भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं यहां तक कि मां-बहन तक को गाली-गलौच में नहीं बख्श रहे हैं। कम से कम यह तो सोचना चाहिए कि जिस भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है वह भाषा एक संवैधानिक पद पर बैठे हमारे देश के किसी भी नेता के लिए उचित होगी। इस दौरान पक्ष का हो या विपक्ष का हो। प्रधानमंत्री से लेकर छोटे से छोटे नेता को एक टटपुंजिया सा कार्यकर्ता मर्यादाहीन भाषा का प्रयोग कर रहा है। क्या ये हमारी संस्कृति है या इस तरह की भाषा का इस्तेमाल हमारा संवैधानिक अधिकार है? क्या ऐसी निलज्ज भाषा से प्रत्याशी की हार या जीत हो जाएगी। ऐसा कुछ नहीं होगा। मगर निंदनीय भाषा इस्तेमाल करने वालों की अपनी औकात जरूर दिख रही है। मगर जनता के सामने ऐसे लोगों की थू-थू जरूर होती है। इसलिए किसी भी पार्टी और नेता के समर्थन या विरोध में शालीन भाषा का इस्तेमाल होना चाहिए।

शिवदयाल मिश्रा

shivdayalmishra@gmail.com

Leave a Comment