महिलाओं का सम्मान या चुनावी चौसर की चाल!

चारों तरफ एक ही बात सुनाई देती है। महिलाओं का सम्मान हो। पहली पंक्ति महिलाओं की। आगे महिला। घर की मुखिया महिला। अरे भाईयो! ये क्या बात हुई महिलाएं तो न जाने कब से घर की मुखिया ही है। क्या तुम्हारे या हमारे कहने मात्र से थोड़े ही घर की मुखिया हो जाएगी। घर के कोई भी महत्वपूर्ण काम बगैर घर में महिलाओं की राय के नहीं होते हैं। जन्म से लेकर परण के होते हुए मरण तक किए जाने वाले कोई भी काम बगैर महिलाओं के अथवा महिलाओं की राय के नहीं होते। हमारी संस्कृति में जिस वक्त विवाह (पाणिग्रहण संस्कार) होता है। उस समय ही अग्नि की साक्षी में वर-वधु एक-दूसरे के अधिकार और सम्मान के वचन भरते हैं। अगर उन पर नजर डाल ली जाए तो ये सब झूठे सम्मान देने की जरूरत ही नहीं है। मगर यह वक्त लोकतंत्र शासन प्रणाली का है जिसमें हर कोई अपनी बात अपने तरीके से कहता है। चाहे वह समाज के हित में हो या अहित में। मगर हम उन वचनों को भूल कर या भुलाकर  नए-नए तरीके से अपने हित साधने के लिए महिलाओं को मोहरा बना लेते हैं और उनके सम्मान या रक्षक होने का दम भरते हैं। अभी दिल्ली में महिलाओं को मैट्रो में नि:शुल्क यात्रा की घोषणा की गई है। इतने दिनों से क्यों नहीं की? क्या ये घोषणा जायज है। जब हमारा संविधान सबको समानता का अधिकार देता है तो फिर क्यों नहीं सब को मैट्रो में यात्रा फ्री की जाती है। क्यों सिर्फ महिलाओं को ही यह सुविधा प्रदान की जाती है। नहीं, हमारी सोच का केन्द्र बिन्दु तो महिलाओं के वोट हथियाने का है। क्या मैट्रो में फ्री यात्रा कराने से दिल्ली में महिलाएं एक पार्टी को वोट डालेंगी।  क्या हमारा लोकतंत्र यही कहता है। इस तरह से प्रलोभन देकर वोट बटोरने की नीति के तहत क्या यह जायज है। और फिर अगर महिलाओं को ये सुविधा देनी है तो क्यों नहीं पार्टी अपने काउंटर खोलकर महिलाओं को वहां फ्री टिकट उपलब्ध कराती है। कमाल की बात है आज चारों तरफ फ्री-फ्री-फ्री का बोलबाला है। ये पार्टियां कब तक फ्री के नाम पर वोट बटोरती रहेगी। क्यों ये पार्टियां अपने वोटों के लिए मध्यम वर्ग के खून पसीने से भरे टैक्स को खैरात में बांटते रहेंगे। कहीं बेरोजगारी भत्ता, तो कहीं ऋण माफी। आदमी को खुद्दारी से जीने के बजाए ये पार्टियां फोकटिया बनाने पर तुली हुई है। वैसे ही देश में रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचारी और कामचोरी भरी पड़ी है। अब एक जमात फोकटियों की भी खड़ी की जा रही है। कहां जा रहे हैं हम। किस दिशा में देश को ले जाया जा रहा है।

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